Skip to main content

लॉकडाउन और पाश

आजकल जब मैं अपनी बालकनी पर आता हुँ तो कुछ पल के लिये निराश हो जाता हुँ। मुझे दुख होता है उन लोगों के लिये जो इतने पैसे दे कर बालकनी वाले घरो में रह तो रहें हैं पर कभी बालकनी पर आते नहीं।

कमरा लेते वक्त क्या इन लोगों ने भी मेरी तरह रोज़ शाम बालकनी में आकर भीनी भीनी हवा का आनंद लेने की कल्पना की होगी? क्या इन्हें भी दो मिनट की उस खामोशी में सुकून की दो सांसे लेना पसंद होगा? शायद हाँ, पर मैं समझ सकता हुँ, शहर की भाग दौङ में छोटे छोटे सपने अकसर नज़रअंदाज़ हो जाते हैं। याद ही नहीं रहता कि दो वक्त रुक कर इन लम्हों को भी जी लें जिन्हें जीने की आज़ादी के लिये इतनी मेहनत कर रहें हैं।

पर दुख इस बात का है कि अब जब दुनिया यूँ रुक गई है और वक्त यूँ थम गया है, तब भी गुमशुदा सपने अपने घर नहीं लौट पा रहे। शायद लॉकडाउन ने उन्हें भी थाम लिया है।पाश की लिखी हुई कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं...

मुट्ठियां भींचकर बस वक़्त निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना

सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है